पौलेंड में गर्भपात बैन के विरोध से लेकर दिल्ली घेर बैठे किसानों तक, वो आन्दोलन जो 2020 की पहचान बनें

 पौलेंड में गर्भपात बैन के विरोध से लेकर दिल्ली घेर बैठे किसानों तक, वो आन्दोलन जो 2020 की पहचान बनें

दुनिया भर में कोरोना संक्रमण के बावजूद इस साल लोगों ने अपनी मांगो को लेकर सड़कों पर आंदोलन किया। भारत में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और किसान आंदोलन के विरोध में जगह जगह धरना प्रदर्शन हुए तो वहीं कई देशों में राजनीतिक उठापटक, महिलाओं के खिलाफ आत्याचार और नए कानूनों के विरोध में प्रदर्शन हुए।

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नागरिकता संशोधन कानून का विरोध

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नरेंद्र मोदी सरकार ने दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) बनाया था। इस कानून के पास होने के कुछ दिनों बाद इस पर बवाल शुरू हुआ। महीनों तक इस बवाल का असर दिखा। साल 2020 की शुरुआत होते-होते दिल्ली के शाहीन बाग समेत कई इलाकों में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शन होने लगे।शाहीन बाग तो सीएए और एनआरसी के विरोध का एक एक मॉडल बन गया, जिसकी फ्रंट पर अगुवाई स्थानीय युवा और बुजुर्ग महिलाओं के हाथों में थी।इन प्रदर्शनकारियों में जो नाम सबसे ज्यादा उभरकर सामने आया वह है बिल्किस बानो, जिन्हें टाइम मैगजीन ने सितंबर 2020 में दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में जगह दी।

किसान आंदोलन

केंद्र सरकार सितंबर महीने में 3 नए कृषि विधेयक लाई, जो संसद की मंजूरी और राष्ट्रपति की मुहर के बाद कानून बने. लेकिन किसानों को ये कानून रास नहीं आ रहे हैं. उनका कहना है कि ये कानून किसान विरोधी हैं और कॉरपोरेट्स को फायदा पहुंचाने वाले हैं. किसानों को इन कानूनों से फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) खत्म हो जाने का डर सता रहा है. पंजाब, हरियाणा समेत कई राज्यों के किसान इन कृषि कानूनों का लगातार विरोध कर रहे हैं. 26 नवंबर से अनकों किसान दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर डटे हुए हैं और लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. केन्द्र सरकार के साथ उनकी कई दौरों की बातचीत अब तक बेनतीजा रही है. किसान इन तीनों कानूनों को वापस लिए जाने की मांग कर रहे हैं.

राजघरानों के कानून के खिलाफ थाईलैंड में आंदोलन

थाईलैंड में जुलाई 2020 के मध्य से बैंकाक और अन्य शहरों में लोकतंत्र समर्थकों ने राजशाही के खिलाफ आंदोलन चलाया हुआ। लोकतंत्र समर्थक 10 दिसंबर को एक सभा का आयोजन कर देश के शीर्ष राजघरानों की आलोचना करने पर दंडित करने के कानून को हटाए जाने की मांग की थी। 10 दिसंबर को थाईलैंड का संविधान दिवस और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस भी मनाया जाता है। इस कानून के तहत देश के शीर्ष राजघरानों का अपमान करने और उनकी आलोचना करने पर दंडित करने का प्रावधान है। प्रदर्शनकारी यह आयोजन राजशाही का विरोध कर रहे नेताओं के खिलाफ इस कानून का प्रयोग के चलते कर रहे हैं। एक दर्जन से अधिक विरोध नेताओं पर इस लेज़ मेजेस्टी कानून के आरोप लगे हैं जिसमें 15 साल तक जेल की सजा का प्रावधान है।

नेपाल आंदोलन

नेपाल की सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (NCP) में कलह लंबे वक्त से चलती आ रही है। अभी तक पार्टी के को-चेयर पुष्प कमल दहल प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे की मांग करते आ रहे थे, अब देश में अलग ही मांग जोर पकड़ने लगी है। नेपाल में दिसंबर माह में पोखरा और बुटवाल जैसे बड़े शहरों में विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है जहां मांग की जा रही है प्रजातंत्र को खत्म करने की। इन लोगों की मांग है कि दुनिया की आखिरी हिंदू राजशाही को वापस लाया जाए। देश के कई शहरों में फेडरल डेमोक्रैटिक रिपब्लिकन सिस्टम के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं जिसे नेपाल में 2008 में लागू किया गया था। इसे 240 साल से चल रही राजशाही खत्म करने के बाद लागू किया गया था।

पोलैंड में अबॉर्शन पर बैन के खिलाफ आंदोलन

पोलैंड में अबॉर्शन (गर्भपात) पर पूरी तरह से बैन लगाए जाने के फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए। कोरोना की महामारी के बावजूद हजारों लोग अक्टूबर माह में सड़कों पर उतरे और इस फैसले का विरोध किया। प्रदर्शनकर्ताओं ने कई शहरों में रैलियां निकालीं। पोलैंड की संवैधानिक अदालत ने अक्टूबर में फैसला दिया था कि गर्भपात की इजाजत देने वाला मौजूदा कानून जिंदगी की रक्षा करने में असमर्थ है। इस कानून में ऐसे भ्रूण को गिराने की इजाजत थी जो सही से विकसित न हुआ हो। इस फैसले के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। फेडरेशन ऑप विमिन ऐंड फैमिली प्लानिंग की हेड क्रिस्टीना काकपुरा ने कहा कि इस फैसले से पोलैंड में गर्भपात पर बैन लग गया है क्योंकि देश में करीब 98% वैध गर्भपात सही से विकसित न हुए भ्रूणों के होते हैं। उन्होंने कहा कि यह पोलैंड सरकार की ओर से आधी आबादी के प्रति एक शर्मनाक फैसला है।

बेलारूस आंदोलन

अगस्त महीने में बेलारूस के इतिहास में सरकार विरोधी अब तक के सबसे विशाल प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारियों का सैलाब उमड़ आया और उन्होंने चुनावों में पारदर्शिता की अपनी मांग को दोहराया। बेलारूस की राजधानी मिंस्क में लाखों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने 9 अगस्त को हुए चुनाव में फिर से राष्ट्रपति अलेक्ज़ेंडर लुकाशेंको की जीत के दावे को ख़ारिज कर दिया। हालांकि राष्ट्रपति लुकाशेंको ने अपने पद से इस्तीफ़ा देने और नए सिरे से चुनाव कराने की प्रदर्शनकारियों की मांग को रद्द करते हुए कहा है कि अगर वह दबाव में आकर नए चुनाव पर सहमति जता देते हैं तो एक देश के रूप में बेलारूस की मौत हो जाएगी।

हाथरस केस के खिलाफ आंदोलन

हाथरस में दलित युवती के साथ हुए दुष्कर्म मामले में शुक्रवार, 2 अक्तूबर गांधी जयंती के दिन दिल्ली के जंतर-मंतर पर नागरिक समाज, छात्र, महिलावादी संगठन और कई राजनेताओं ने घटना के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त प्रदर्शन किया। जिसके बाद  देर शाम प्रशासन की ओर से निलंबन के कार्रवाई की ख़बर आई। मुख्य सचिव गृह अवनीश कुमार अवस्थी के अनुसार इस संबंध में एसपी, डीएसपी, इंस्पेक्टर और कुछ अन्य अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। इससे पहले पीड़िता को न्याय दिलवाने के लिए नागरिक समाज और विपक्षी दलों ने 30 सितंबर को राष्ट्रीय प्रतिवाद दिवस (नेशनल प्रोटेस्ट डे) सितंबर मनाया। देश के कई इलाकों में जोरदार प्रदर्शन हुए।

तुर्की में महिलाओं के खिलाफ हो रहे आत्याचार के खिलाफ आंदोलन

तुर्की में इस साल महिलाओं ने घरेलू हिंसा के विरोध में रैली का आयोजन किया। साथ ही प्रशासन से आग्रह किया है कि वह इसके खिलाफ निर्णय ले। इंस्तानबुल में 5 अगस्त बुधवार को प्रदर्शनकारियों ने उन महिलाओं की नामों वाली तख्तियां हाथ में ली हुई थीं, जिनकी उनके रिश्तेदार या फिर उनके जीवनसाथी द्वारा हत्या कर दी गई है। साथ ही यौन प्रताड़ना सहित महिलाओं के खिलाफ हो रहे अन्य अपराधों का विरोध किया। महिलाओं के हक के लिए लड़ने वाली संस्था लगातार तुर्की की सरकार से कह रही है कि काउंसिल ऑफ यूरोप कंवेंशन को महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों और घरेलू हिंसा के खिलाफ सख्ती से लागू करें।

लंदन में लॉकडाउन का विरोध

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने 31 अक्टूबर को इंग्लैंड में दूसरे लॉकडाउन की घोषणा की थी जो पांच नवंबर से शुरू हुआ तथा दो दिसंबर तक प्रभावी रहेगा। लॉकडाउन के तहत लगी पाबंदियों में बड़ी संख्या में लोगों के एकत्रित होने पर रोक है। इस लॉकडाउन के विरोध में मध्य लंदन में जनता सड़कों पर उतर गई। प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों ने 155 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है। कोविड-19 महामारी के बीच लोगों को एकत्र होने से रोकने के लिए यह कदम उठाया गया ।

सुशांत को न्याय दिलाने दुनिया भर में आंदोलन

14 जून को दुनिया को अलविदा करने वाले सुशांत को न्याय दिलाने की मुहिम सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर से उठने लगी। सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से जस्टिस फॉर एसएसआर की आवाज तेज होने लगी। कैलिफोर्निया में जैसे बड़े शहरों में बिल बोर्ड में सुशांत की फोटो लगाई गई। केस को  6 माह बीत जाने के बाद भी मामले में इंसाफ न मिलने का आरोप लगाते हुए दिसंबर माह मेंजंतर-मंतर पर एक प्रशंसक व बॉलीवुड के निर्देशक विजय शंकर गुप्ता इंसाफ की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गए थे। उनका कहना था कि वह जब तक पुलिस और सीबीआई आरोपितों को गिरफ्तार नहीं करती हैं तब तक वे अनशन खत्म नहीं करेंगे। कई बड़े सितारे भी सोशल मीडिया पर सुशांत को इंसाफ दिलाने की मुहिम लगातार चला रहे है।

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Nisha Sharma

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