भारत नहीं, “INDIA” को आत्मनिर्भर बनने को कहता है प्रधानमंत्री जी का संदेश: आयुष पाण्डेय

 भारत नहीं, “INDIA” को आत्मनिर्भर बनने को कहता है प्रधानमंत्री जी का संदेश: आयुष पाण्डेय

कहते हैं कि बात भले ही छोटी कही जाए, लेकिन बात ऐसी कही जाए कि “बात में दम हो”
लेकिन आजकल बातें ऐसी भी होने लगीं हैं जब माइक्रो ब्लॉगिंग का जमाना हैं, इसमें सहमति को भी अँगूठा दिखाकर चलता कर देते हैं।
वहीं कुछ लोग बातें ऐसी भी करते हैं जिनमें दम हो न हो लेकिन दो बात कहने में इतनी दमदारी दिखाते हैं कि सामने वाले का सुनते सुनते दम निकल ही जाए।
ख़ैर, अब मुद्दे पर आते हैं, ये तो हुई ऐसे ही हल्की बात। मुझे ही देख लो प्रधानमंत्री जी का 2 लाइन का देशव्यापी संदेश बताने के लिए 5 पैराग्राफ़ लिख दिए। मैं आपका दम नहीं निकालूँगा।
तो बात ऐसी है कि कल सुबह प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ़ से ऐलान हुआ कि माननीय हमेशा की तरह अपने पसंदीदा 8PM (ब्राण्ड नहीं, समय) के साथ उपस्थित होंगे।
देश पुनः अपने राष्ट्र सेवक को सुनने की प्रतीक्षा कर रहा था। “लोकल” घड़ियों की टिक-टिक वाली आवाज और अधिक “वोकल” हो रही थी। रसोई में रखी थाली, चिमटे को देख रही थी। अलमारी में रखी टॉर्च ख़ुद करवट बदलकर बैटरी के वज़न के हिसाब से उसकी क्षमता जाँच रही थी।
8 बजे, साहेब ने अवतार लिया। यह संदेश भाईयों-बहनों या मित्रों से नहीं बल्कि “सभी देशवासियों को आदरपूर्वक नमस्कार” करके प्रारम्भ हुआ था।
34 मिनट के संदेश के शुरुआती 18 मिनट को यदि आप आँखें बंद करके सिर्फ़ सुनें तो आपके दिमाग़ में लाल क़िले की प्राचीर पर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भाषण देते हुए भारत का प्रधानमंत्री आकार लेने लगता है।
इन 18 मिनट में सड़क पर पैदल चल रहे मज़दूरों के छालों में भरा हुआ पानी अपने ठहराव की आशा को लेकर और अधिक उत्सुक होता जा रहा था। इन 18 मिनट में औरंगाबाद का रेलवे ट्रैक दोबारा ख़ून न चखने के विश्वास को लेकर आश्वस्त होना चाह रहा था।
लेकिन 18 मिनट के बाद ऐलान हुआ कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रधानमंत्री जी 20000000000000 के आर्थिक पैकेज का ऐलान कर रहे हैं। मतलब ये कि गंगा को साफ करने के लिए निर्मल भारत अभियान की घोषणा हो गयी है, लेकिन कब, कैसे और कब तक ये हो पाएगा, इसके बारे में जानकारी नहीं दी गयी। कहा गया कि देश की महान और अति लोकप्रिय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण जी इसका ऐलान चरणबद्ध तरीक़े से आगामी कुछ दिनों में करेंगी।
इस सबके बीच प्रधानमंत्री जी ने जिस शब्द पर सर्वाधिक फ़ोकस किया वह शब्द था “आत्मनिर्भर भारत”
अगर हिंदी समाचार चैनल ABP NEWS की मानें तो प्रधानमंत्री जी ने अपने संदेश में 59 बार ‘भारत’ और 38 बार ‘आत्मनिर्भर’ शब्द का प्रयोग किया है। मैं इस आँकड़े के प्रति सहमति जता सकता हूँ क्योंकि पूर्व में कई बार संसद में प्रधानमंत्री जी द्वारा टेबल थपथपाने और ताली बजाने की संख्या का भी आँकलन लगभग सभी समाचार चैनलों द्वारा सटीक किया गया है।

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इस आत्मनिर्भर के साथ साथ प्रधानमंत्री जी ने कहा कि देश अब ‘लोकल’ का प्रयोग करें और न केवल प्रयोग करें बल्कि इसका प्रचार करें। उन्होंने कहा कि हम सब कुछ अब भारत में ही करेंगे और हम आत्मनिर्भर बनेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उनके आने से पहले खादी की कोई बात नहीं होती थी, लोग कम ख़रीदते थे। लेकिन जबसे उन्होंने चरख़ा पर बैठकर फ़ोटो खिंचवाया है तबसे खादी की बिक्री में इतना उछाल आया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक पिलर उसी पर टिका हुआ है। ऐसा सुनकर पूज्य महात्मा गांधी जी की आत्मा ने भी शायद नरेंद्र मोदी जी को प्रणाम किया होगा।
वैसे गांधी जी कहा करते थे कि भारत गाँवों का देश है, भारत की अर्थव्यवस्था भारत के गाँवों और यहाँ पर बसने वाले लोगों पर निर्भर करती है। ये लोग हमारे देश की रीढ़ हैं।
दूसरी तरफ़ है INDIA, जिसमें बसते हैं उच्च वर्गीय लोग। जिनके आटा-दाल से लेकर साबुन और पिज्जा का बेस यानि सबकुछ व्यवस्था गाँवों पर और अन्य देशों पर निर्भर करती है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था सिर्फ़ उनकी व्यवस्था की ही चिंता करती है।
तो यहाँ पर मैं तय ये कर रहा हूँ कि प्रधानमंत्री जी “आत्मनिर्भर” बनने का आवाहन किससे कर रहे थे? INDIA से या भारत से या फिर दोनों से?
अब यहाँ पर मैं अपना पक्ष रखता हूँ
• प्रधानमंत्री जी! अगर रेलवे ट्रैक पर पड़ी हुई रोटियों को खाने वाले आत्मनिर्भर न होते तो शायद वो रोटियाँ खा ली गयीं होतीं। आत्म निर्भर ही तो थे, जो पैदल चल पड़े, थककर सोए तो ऐसा सोए कि कभी न उठे
• प्रधानमंत्री जी! अगर वे आत्म निर्भर न होते तो लॉकडाउन में मशीनों के पहिए बंद होते ही सड़कों पर साइकिलों के लाखों टायर न घिस रहे होते
• प्रधानमंत्री जी! अगर वे आत्म निर्भर न होते तो ये बेचारे भी किसी वन्दे भारत मिशन का इंतज़ार कर रहे होते, जहाँ हवाई जहाज़ न सही ट्रैक्टर में ही भरकर वो अपने गाँव पहुँचते। जहाँ मिनरल वाटर न मिलता तो भी चलता, ये पूड़ी-सब्ज़ी और सत्तू खाने वाली जनता है साहेब।
• अगर ये आत्म निर्भर न होते तो पैदल चलते चलते भूख से 12 साल की बच्ची की मौत न होती साहेब
• न जाने कितनी मौतें इस संकट काल में सिर्फ़ अपने घर पहुँचने की जद्दोजेहद में हुईं हैं

फिर आत्म निर्भर बनना किन्हें है?
• आत्म निर्भर बनना उन्हें है जो दूसरों पर निर्भर हैं
• आत्म निर्भर बनना है उन्हें जिन्हें अपनी गाड़ी से लेकर घर की सफाई ख़ुद करनी होगी
• आत्म निर्भर बनना है उन्हें जिन्हें खाना भी ख़ुद बनाना होगा और बर्तन भी ख़ुद माँजने होंगे
• आत्म निर्भर बनना है उन्हें जिन्हें अपने कपड़ों की सिलवट हटाने को बाज़ार वाली “इस्त्री” पर नज़र नहीं डालनी होगी
• आत्म निर्भर बनना है उन्हें जिन्हें खाना स्वाद के लिए नहीं बल्कि पेट भरने के लिए खाने की आदत डालनी होगी
और साहेब हमारा “भारत” तो नमक माँगता है सिर्फ़, “सॉल्ट” नहीं। वो साबुन माँगता है, शॉवर जेल नहीं। वो मच्छर वाली अगरबत्ती माँगता है साहेब, सुगंध वाला परफ़्यूम नहीं। वो आटा माँगता है साहेब, कॉर्न फ़्लोर नहीं।
और हाँ साहेब, प्रचार भी बहुत “वोकल” होकर करता है वो “लोकल” का
• उसके रिक्शे पर “सतेंद्र सत्तू” का पर्चा चिपकता है, “डोमिनोज पिज्जा” का नहीं
• उसकी सब्ज़ी की ठेली पर भी साहेब “जापानी पार्क चलो” वाली आपकी रैली का बैनर ही बिछा है
• जिस अख़बार से वो अपनी “इस्त्री” के कोयले को सुलगाता है साहेब, उस पर भी लिखा है कि “अहमदाबाद से मुम्बई जलेगी बुलेट ट्रेन, जापान के साथ हुआ क़रार”
और कितना “लोकल” का प्रचार करे साहेब हमारा भारत?
अब चिंता तो आत्मनिर्भर बनने की उन्हें करनी है जिनके घर के बाहर “Don’t Park Your Car Here” लिखा होता है, हमारे भारत में तो “सुस्वागत” या “पधारिए” लिखा होता है।
इसलिए मेरा मानना है कि “भारत” पहले से ही “आत्म निर्भर” है, इस संकटकाल में शायद “INDIA” आत्म निर्भर बनना सीख जाए।

 

यह भी देखें

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Shrikant Baghmare

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