राजनीति, पत्रकारिता से लेकर साहित्य तक, 2020 ने छ्त्तीसगढ़ से भी बहुत कुछ छीन लिया

 राजनीति, पत्रकारिता से लेकर साहित्य तक, 2020 ने छ्त्तीसगढ़ से भी बहुत कुछ छीन लिया

अजीत जोगी

Header Ad

अजीत प्रमोद कुमार जोगी छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बिलासपुर के पेंड्रा में जन्में अजीत जोगी ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद पहले भारतीय पुलिस सेवा और फिर भारतीय प्रशासनिक की नौकरी की। बाद में वे मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सुझाव पर राजनीति में आये। वे विधायक और सांसद भी रहे। कहा जाता है कि 1986 में कांग्रेस को मध्य प्रदेश से ऐसे शख्स की जरूरत थी जो आदिवासी या दलित समुदाय से आता हो और जिसे राज्यसभा सांसद बनाया जा सके। जिसके बाद अजीत जोगी कांग्रेस से 1986 से 1998 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। इस दौरान वह कांग्रेस में अलग-अलग पद पर कार्यकरत रहे, वहीं 1998 में रायगढ़ से लोकसभा सांसद भी चुने गए। बाद में 1 नवंबर 2000 में जब छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ, तो उस क्षेत्र में कांग्रेस को बहुमत था। कांग्रेस ने बिना देरी के अजीत जोगी को ही राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया। जोगी 2003 तक राज्य के सीएम रहे। उसके बाद जोगी की तबीयत खराब होती रही और उनका राजनीतिक ग्राफ भी गिरता गया, लगातार वह पार्टी में बगावती तेवर अपनाते रहे और अंत में जोगी ने 2016 में कांग्रेस से बगावत कर अपनी अलग पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के नाम से गठन किया। 2018 में उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ बसपा के साथ गठबंधन किया लेकिन उन्हें सियासी कामयाबी नहीं मिली।

Header Ad

अजीत जोगी अपनी जाति को लेकर भी विवादों में रहे। कुछ लोगों ने दावा किया कि अजीत जोगी अनुसूचित जनजाति से नहीं हैं। मामला अनुसूचित जनजाति आयोग से होते हुए हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। लेकिन अजीत जोगी कहते रहे हैं कि हाईकोर्ट ने दो बार उनके पक्ष में फैसला दिया है। मगर सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच करने की बात कही। यह जांच छत्तीसगढ़ सरकार के पास है। 29 मई 2020 को अजीत जोगी की दिल का दौरा पड़ने से एक नारायण अस्पताल में मृत्यु हो गई।

ललित सुरजन

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी समाचार पत्र ‘देशबंधु’ के प्रधान संपादक ललित सुरजन का 74 वर्ष की उम्र में 2 दिसंबर 2020 को निधन हो गया। उन्हें प्रगतिशील विचारक, लेखक, कवि, पत्रकार और संपादक के रूप में पहचाना जाता था। सुरजन को कैंसर के इलाज के लिये दिल्ली ले जाया गया था। जहां 30 नवंबर को अचानक मस्तिष्काघात (ब्रेन स्ट्रोक) होने के बाद उन्हें धर्मशीला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लेकिन उन्हें बचाया नही जा सका, उनके परिवार में पत्नी और तीन बेटियां हैं। वह साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सद्भाव व विश्व शांति से सम्बंधित मुद्दों पर हमेशा बेबाक राय रखते थे। दुनिया भर के देशों की संस्कृति और रीति-रिवाजों की जानकारी रखने का भी उनको बहुत शौक़ था। ललित सुरजन ने पहले ही अपने सभी भाइयों को देशबंधु के अलग-अलग संस्करणों की ज़िम्मेदारी दे दी थी।

मनीष दत्त

10 मई वर्ष 1940 को एक मध्यमवर्गीय बंगाली परिवार में जन्मे बिलासपुर शहर के कला मनीषी व काव्य भारती कला संगीत मंडल के निदेशक मनीष दत्त का 79 वर्ष की आयु में 21 फरवरी को हृदयाघात से निधन हो गया। उन्होंने अपना पूरा जीवन कला को समर्पित किया और कला यात्रा निरंतर चलती रहे इसके लिए उन्होंने विवाह भी नहीं किया। मनीष दत्त नाटकों में कविताओं को संगीतबद्ध कर कई अनोखे व रचनात्मक ढंग से पेश करते थे। उनका यह प्रयोग सफल भी रहा। छत्तीसगढ़ के कलाकारों, बुद्धिजीवियों के बीच उनका बड़ा सम्मान रहा है। इंजीनयर बनने का सपना देखने वाले मनीष मात्र 12 वर्ष की उम्र में जयदेव नाटक में मंचावतरण के बाद उनकी रुचियां बदल गई और वे नाटकों के दीवाने हो गए। 12वर्ष से शुरू हुई कला यात्रा के कुछ ही वर्ष बाद उन्होंने 16 वर्ष की अल्पायु में हिन्दी साहित्यिक गीतों को सरल और गेय बनाकर हिन्दी समाज में प्रचारित करने का संकल्प लिया। उनके लिए गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर एक प्रेरणादायक के रूप में रहे। वे उनकी और काजी नजरुल इस्लाम व डीएल राय के गीतों व कविताओं को बड़े गर्व के साथ गाते थे। मनीष दत्त ने वर्ष 1960 में नाट्य भारती संस्था की स्थापना कर नाटकों के माध्यम से साहित्यिक गीतों के कार्यक्रम की शुरुआत की। वहीं इलाहाबाद से लौटकर महादेवी वर्मा के निर्देश और इच्छानुसार तीन जनवरी 1978 को काव्य भारती कला संगीत मंडल की स्थापना की। काव्य भारती संस्थागत रूप से आगे बढ़ती रहे, इसके लिए काव्य भारती की स्थापना के एक साल बाद 1979 में खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय से संबद्ध कर शास्त्रीय संगीत नृत्य के लिए कला संगीत वीथिका की स्थापना की।

मोतीलाल वोरा

20 दिसंबर 1928 को वोरा का जन्म राजस्थान के नागौर में पड़ने वाले निंबी जोधा में हुआ। जिसके बाद उनका परिवार मध्यप्रदेश आ गया। उनकी शिक्षा रायपुर और कोलकाता में पूरी हुई। फिर वोरा पत्रकार बन गए। साइकल से चलाते और नवभारत टाइम्स यानी नभाटा समेत कई अखबारों में खबरें भेजते। फिर पत्रकार रहते हुए ही राजनीति में एक्टिव हो गए। 1968 में दुर्ग से पार्षदे का चुनाव लड़े और जीत भी गए। फिर 1972 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय पूर्व मुख्यमंत्री द्वारकाप्रसाद मिश्र दुर्ग में नया प्रत्याशी ढूंढ रहे थे किसी ने उन्हें वोरा के नाम का सूझाव दिया। फिर वोरा ने कांग्रेस में प्रवेश किया और चुनाव जीत विधायक बने। 1972 के चुनाव के बाद वोरा को राज्य परिवहन निगम का उपाध्यक्ष नियुक्त किया। फिर इमरजेंसी आई और उसके बाद 1977 में जनता पार्टी की सरकार आई लेकिन वोरा कांग्रेस विरोधी लहर में भी दुर्ग से 54 फीसदी वोट पाकर जीते। 1980 की जनता विरोधी लहर में उनका आंकड़ा बढ़कर 64 फीसदी हो गया। इसके बाद 1981 में एमपी में अर्जुन सिंह की सरकार में वोरा राज्यमंत्री बने उन्हें उच्च शिक्षा विभाग मिला। वोरा ने तत्परता दिखाते हुए कई कॉलेज खोले, कई निजी कॉलेजों का अधिग्रहण किया। 1983 में वोरा को कैबिनेट मिनिस्टर बना दिया गया। 1999 के लोकसभा चुनाव में रमन सिंह से हारने के बाद उन्हें सोनिया ने 2002 में राज्यसभा भेज दिया। वोरा लगभग दो दशक कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष और गांधी परिवार के खास रहे। बढ़ती उम्र का हवाला देकर राहुल ने 2018 में उन्हें इस जिम्मेदारी से मुक्त किया।

रविंद्र भेड़िया

छत्तीसगढ़ की महिला एवं बाल विकास मंत्री अनिला भेड़िया के पति और पूर्व आईजी रविंद्र भेड़िया 4 अक्टूबर 2020 को निधन हो गया। हार्ट अटैक आने पर उन्हें एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनका अंतिम संस्कार बालोद के डौंडी लोहारा स्थित पैतृक गांव में किया गया। रविंद्र भेड़िया तीन साल पहले आईपीएस पद से रिटायर्ड हुए थे। इसके बाद से ही वे बालोद में लगातार सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे। कोरोना संक्रमण से ठीक होने के बाद वे घर लौटे थे। 4 अक्टूबर को वे वॉशरूम गए और वहीं हार्टअटैक आने पर गिर पड़े। रविंद्र भेड़िया अपने समय के तेज तर्रार पुलिस अफसरों में गिने जाते थे। रिटायर्ड के बाद से ही समाजसेवा में सक्रिय थे। उनके कांग्रेस से चुनाव लड़ने की भी अटकलें लगाई जा रही थीं। हालांकि उनकी पत्नी अनिला भेड़िया को टिकट मिला और वे जीतकर प्रदेश सरकार में मंत्री बनीं। भेड़िया बिलासपुर, रायगढ़ में लंबे समय तक एडिशनल एसपी रहे। बस्तर पोस्टिंग के दौरान नक्सलियों के खिलाफ बहादुरी से कार्रवाइयां की। नारायणपुर एसपी रहने के दौरान नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर उनकी गाड़ी उड़ा दी थी। वे गंभीर रूप से जख्मी हुए थे लंबे समय तक वे अस्पताल में रहे। स्वास्थ्य होकर लौटने के बाद फिर से नक्सली ऑपरेशन में जुट गए थे।

महेंद्र सिंह टेकाम


डौंडीलोहारा विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक लाल महेंद्र सिंह टेकाम का 11 दिसंबर 2020 को निधन हो गया। उनकी तबियत ठीक न होने के कारण 10 दिसंबर को उन्हें इलाज के लिए रायपुर लाया गया था। लाल महेंद्र सिंह टेकाम डौंडीलोहारा राजघराना परिवार से संबंध रखते थे। वे स्व. लाल रघुवीर सिंह व स्व. रानी लक्ष्मीदेवी टेकाम के द्वितीय पुत्र थे। उन्हें मुखाग्नि उनके पुत्र निवेन्द्रसिंह टेकाम ने दी। लाल महेन्द्र सिंह टेकाम डौंडीलोहारा विधानसभा क्षेत्र से 2003 के विधानसभा चुनाव में जीत कर विधायक बने थे। इसके पूर्व यह क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। भाजपा ने राजपरिवार के लाल महेंद्रसिंह को चुनाव मैदान में उतारा था और वे विजयी हुए थे। 2008 के विस चुनाव में पत्नी नीलिमा सिंह टेकाम को टिकट दिया था वे भी चुनाव जीत कर विधायक बनी थीं। 2018 में पुनः भाजपा ने लाल महेंद्रसिंह को टिकट दिया था परंतु वे वर्तमान विधायक व कैबिनेट मंत्री अनिला भेड़िया से चुनाव हार गए थे। इनकी दादी स्व. झमित कुंवर देवी भी अविभाजित मप्र में कांग्रेस से विधायक बनी थीं।

चनेश राम राठिया

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और आदिवासी समाज से बड़े नेता व पूर्व मंत्री चनेश राम राठिया की 78 वर्ष की उम्र में 14 सितंबर 2020 सोमवार को रायगढ़ के ओपी जिंदल अस्पताल में कोरोना वायरस के इलाज के दौरान मौत हो गई। चनेश राम राठिया अविभाजित मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री रहे। वे मध्य प्रदेश सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री रहे। छत्तीसगढ़ शासन में पूर्व मुख्यमंत्री स्व.अजीत जोगी के नेतृत्व में बनने वाली प्रथम सरकार में वह धर्मस्व मंत्री भी थे। राठिया ने 1977 आपातकाल के दौरान कांग्रेस की टिकट में चुनावी रण मे उन्होंने जीत हासिल की थी। हालांकि 1975 में अविभाजित मध्यप्रदेश में खरसिया धरमजयगढ़ का विभाजन नही हुआ तब उन्होंने अपना पहला चुनाव बतौर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़े, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद वे 2003 तक बने रहे। चनेश राम ने लगभग 3 दशक तक धरमजयगढ़ विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया। वे कुल 6 बार अपने निर्वाचन क्षेत्र से विधायक रहे हैं।

 

Header Ad

Nisha Sharma

Related post

Open chat
Join Us On WhatsApp