क्या, आप 36गढ़ की इन 36 भाजियों के बारे में जानते हैं? इन प्रदेशों तक होती है सप्लाई

 क्या, आप 36गढ़ की इन 36 भाजियों के बारे में जानते हैं? इन प्रदेशों तक होती है सप्लाई

छत्तीसगढ़ में कई तरह की भाजी को खाने में शामिल किया जाता है। अलग अलग स्वाद में होने के साथ इनमें कई गुणकारी पोषक तत्व भी मौजूद होते है जो शरीर को बिमारियों से दूर रखने में मदद करते है।

Header Ad

छत्तीसगढ़ की प्रमुख भाजियां

चौलाई – 12 महिनों की भाजी के रूप में पहचाने जाने वाली भाजी है चौलाई। थोड़ा स्वाद मेथी और पालक के बीच का होता है, लेकिन स्वास्थ के लिए काफी लाभदायक है। रक्त के संचार और धमनियों के विकास में सहायक होती है।

मूली भाजी – मूली भाजी ठंड में शरीर के लिए काफी लाभदायक है। इसके अलावा यह चर्म रोग जैसी समस्याओं को भी दूर करती है।

भथुआ भाजी – पालक की तरह स्वाद वाली भथुआ काफी स्वास्थवर्धक है। कभी शफैयता बना लो या फिर चने की दाल के साथ मिश्रण से स्वाद और अनोखा हो जाता है। वहीं विटामिन और प्रोटिन की सर्वाधिक रहती है। पैरों के लिगामेंट के लिए फायदेमंद।

खेड़ा भाजी – सर्दी-जुखाम में जेड़ा भाजी का पेय पदार्थ पीने से काफी हद तक आराम मिलता है। तासीर गर्म होने के कारण ये ठंड में काफी फायदे मंद है।

चरोटा भाजी – समान्यत: पेट दर्द की समस्या में ग्रामीण चरोटा को खाना पसंद करते हैं। स्वाद पनसुत्ते जैसा लेकिन शरीर के लिए काफी फायदेमंद है। पेचिस हो या फिर पेट का मरोड़ सभी के लिए ये भाजी लाभदायक है।

चुनचुनिया भाजी – पचाऊ भाजी चुनचुनिया भाजी। कभी पेट साफ न हो। शरीर भारी लग रहा हो तो इसे खाना प्रदेश के ग्रामीण पसंद करते हैं। जो भी पेट में जमा हो साफ हो जाता है।

गोभी भाजी – गोभी समान्यत: सभी को पसंद आती है लेकिन उसके पत्ते को बहुत ही कम लोगों ने चखा है। विटामिन सी से परिपूर्ण पत्ता शरीर की हड्डियों के विकास और युवा अवस्था में शारीरिक विकास के लिए कारगर है।

चना भाजी – चना की स्वाद सभी को पसंद होता है, लेकिन इसकी पत्ती भी काभी कारगर है। कभी हाजमा खराब हो तो चना भाजी खा हो पेट साफ हो जाएगा।

लाखड़ी/तिवरा भाजी – प्रदेश की स्थानिय दाल लाखड़ी खूब खाई जाती है, लेकिन इसकी पत्तियों की भाजी भी खूब पसंद की जाती है। आयरन और कैल्शियम से परिपूर्ण है, लेकिन अधिक मात्रा में खाने से नुकसान करती है।

कुसमी भाजी – पत्तियों की बनावट के कारण अनोखी दिखने वाली कुसमी भाजी आयुर्वेद में काफी कारगर है। इसके रस को पीने से गले की खरास दूर हो जाती है।

मास्टर भाजी – पालक की तरह स्वाद रखने वाली मास्टर भाजी है। इसमें फाइबर की मात्रा अधिक होती है।

अमारी भाजी – खट्टा भाजी के नाम से जाने वाली अमारी भाजी काफी लाभदायक है। पेट मरोड रहा हो या फिर अपच हो रही है तो थोड़ी सी अमारी भाजी उसके लिए लाभदायक होती है।

पटवा भाजी – खट्टी भाजी में दूसरी भाजी। स्वाद भी अनोखा। खासकर इसकी चटनी खूब पसंद की जाती है, लेकिन गर्मी के दिनों में लू से बचाती है।

कुम्हड़ा भाजी – कद्दु के पत्ते की भाजी को ही कुम्हड़ा भाजी कहा जाता है। जिस भी व्यक्ति के बाल झड़ रहे हैं वह इसका सेवन करें तो बाल झड़ना रूक जाएगा।

लाल भाजी – चावल के साथ लाल भाजी का स्वाद लजीज लगता है। गर्मी के दिनों में पेट के लिए काफी लाभदायक है।

 

कांदा भाजी – बेल के आकार में फलने वाली भाजी को कांदा भाजी के नाम से जाना जाता है। त्वचा संबंधी बीमारी के लिए लाभदायक।

करमत्ता भाजी – बेसन के साथ बनाओ तो स्वाद आता है। मुंह के छाले को ठीक करता है।

मूनगा भाजी – मूनगा की पत्तियां को ही मूनगा भाजी के नाम से जाना जाता है। आंखों की रोशनी के लिए लाभदायक।

तिनपनिया भाजी – जंगलों में पाई जाने वाली तिपनिया भाजी खूब पसंद की जाती है। शरीर में किसी भी प्रकार का दाद, खुजली हो रही है तो यह लाभदायक है।

कूलथी भाजी – किडनी से संबंधित बीमारियों के लिए लाभदायक है। किडनी में होने वाली पथरी को दूर करने में सहायक है।

जरी भाजी – इस भाजी को मूंगना की तरह खाया जाता है। ग्रीन ब्लड के सेल्स सबसे अधिक इसी में पाए जाते हैं।

चनौटी भाजी – खास तरह की भाजी में चनौटी भाजी पाई जाती है। इसे बस्तर के लोग सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। जोड़ के दुखने और दर्द की समस्या के लिए उपयोग की जाती है।

बोहार भाजी – लसोड़ा या लभेरा (बहुवार) के वृक्ष के पुष्प-कलिओं के गुच्छे ही बोहार भाजी के रूप में छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय है । जो जंगल और बगीचों में पाया जाता है। इसके फल का काढ़ा बनाकर पिने से छाती में जमा हुआ सुखा कफ पिघलकर खांसी के साथ बाहर निकल जाता है। इसका फल मधुर-कसैला, शीतल, विषनाशक, कृमि नाशक, पाचक, मूत्राल और सभी प्रकार के दर्द दूर करने वाला होता है।

मुस्केनी भाजी – इसे चुहाकन्नी भी कहते है। यह जमीन पर रेंग कर बढ़ती है । दल-दल स्थानों और नम भूमियों और धान के खेत में यह खरपतवार के रूप में उगती है। इसकी मुलायम पत्तियों और कोमल शखाओं को तोड़ कर भाजी पकाई जाती है । यह भाजी किडनी के लिये फायदेमंद होती है ।

कोंझियारी भाजी – जंगल में उगने वाला सफ़ेद मूसली का पत्तों को कोंझियारी भाजी काहा जाता है। बस्तर के बनवासियों का मानना है कि इस भाजी को साल में एक बार जरूर खाना चाहिए। इसे खाने से बीमारी नहीं होती है।

चेंच भाजी – जूट (टिलीएसी) कुल का झाड़ीदार पौधा है। इसकी मुलायम एवं चिकनी पत्तियों तथा कोमल टहनियों को तोड़कर सब्जी भाजी के रूप में प्रयोग किया जाता है। चेच भाजी का औषधीय महत्त्व भी है और इसकी पत्तियां मूत्र वर्धक होती है तथा पेट साफ़ करने के लिए उपयोगी पाई गई है । इसकी पत्तियों का प्रयोग भूख और शक्ति बढ़ाने के लिए भी किया जाता है।

पोई भाजी – इसकी दो प्रजातियाँ होती है। एक हरे पत्ते वाली और दूसरी हरे जामुनी पत्तों वाली होती हैं । इसकी पत्तियों एवं मुलायत टहनियों की भाजी बनाई जाती है। पोई भाजी हड्डियों-दांतों को मजबूत बनाने के साथ-साथ पेट को स्वस्थ्य रखती है. शरीर में खून बढाती है और रोगों से लड़ने की ताकत देती है।

इमली भाजी – इमली पेड़ की नई कोमल पत्तियों को पकाकर भाजी के रूप में भी खाया जाता है। इसके पत्ते शरीर को शीतलता प्रदान करते है और पेट के कीड़ों को नष्ट करने में मदद करते है। पीलिया के इलाज में भी इसके पत्ते उपयोग में लाये जाते है। इमली की कोमल पत्तियां जलने से उत्पन्न घाव के इलाज में लाभकारी पाई गई है।

पालक भाजी – सामान्यत: पालक में पचुर मात्रा में आयरन पाया जाता है। इसके अलावा विटामिन ए और कैल्शियम भी अधिक होता है।

प्याज भाजी – मैथी के बाद प्याज की भाजी से भी छौंक खूब लगाया जाता था। इसके अलावा प्याज भाजी काफी कारगर है। पेट में सल्फर, आयरन और विटामिन सी सभी की मात्रा पर्याप्त मात्रा में पहुंचाती है।

पहुना भाजी – पहुना भाजी कुछ ही प्रदेश के इलाकों में पाई जाती है। खास बात ये है कि गर्भवर्ती महिलाओं के लिए यह काफी लाभदायक है।

केनी भाजी – प्रदेश के सीमा रेखा पर इस भाजी को ज्यादा उगाया जाता है। खास बात ये है कि केनी में कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो नसों की खिचाव को दूर करते हैं।

उरीद भाजी – उरद दाल के पौधे की पत्ती को उरीद भाजी के नाम से जाना जाता है। खास बात ये है कि भाजी में सभी प्रकार के विटामिन और प्रोटिन पाए जाते हैं।

अमुर्री भाजी – अमुर्री भाजी ऐसी भाजी है जो बच्चों को खिलाई जाती है ताकी उनके विकास में कारगर हो।

झुरगा भाजी – झुरगा का अर्थ सामान्यत: रसेदार के रूप में जाना जाता है लेकिन इस भाजी को ही झुरगा भाजी कहा जाता है। सभी तरह के मिनलर पाए जाते हैं।

खोटनी भाजी – सल्फर से लेकर आयरन सभी कुछ खोटनी भाजी में पाया जाता है।

थोक बाजार में भाजियों की खपत

केवल राजधानी रायपुर के थोक बाजार में करीब 12 टन भाजियों की खपत प्रतिदिन होती है। यहां आने वाले भाजियों की सीमावर्ती राज्यों महाराष्ट्र, ओड़िसा, उत्तरप्रदेश, झारखंड और मध्यप्रदेश में सप्लाई की जाती है।

Header Ad

Shrikant Baghmare

Related post

Open chat
Join Us On WhatsApp