छत्तीसगढ़ बजट: क्या चाहते हैं आदिवासी? जानिये, विशेषज्ञ क्या कहते हैं

 छत्तीसगढ़ बजट: क्या चाहते हैं आदिवासी? जानिये, विशेषज्ञ क्या कहते हैं

रायपुर, तोपचंद। सोमवार सुबह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपने कार्यकाल का तीसरा बजट पेश करने वाले हैं। छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य राज्य के रूप में जाना जाता है । ऐसे में आदिवासियों के लिए बजट कैसा होना चाहिए, इस मुद्दे पर तोपचंद डॉट कॉम ने एक्सपर्ट्स से बातचीत की है।

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योजनाओं और जमीनी हकीकत में अंतर साफ़ दिखाई देता है – गंगा भाई

गंगा भाई पैंकरा

आदिवासी विकास पर सुरगुजा संभाग में वर्षों से कार्य कर रहे गंगा भाई पैकरा के अनुसार आदिवासियों के विकास के लिए काफी बजट बनते है, प्लान भी बनते है लेकिन जमीन पर देखने को नहीं मिलते।

उदाहरण के तौर पर राज्य और केंद्र के ट्राइबल डेवलपमेंट प्लान के तहत बहुत सी योजनाएं बनती है लेकिन उन योजनाओं को आदिवासियों के साथ विचार विमर्श कर जमीनी स्तर पर पूरा नहीं किया जाता।

वे आगे कहते है कि ‘में आदिवासियों के लिए रोड या बिजली का विरोध में नहीं कर रहा, यह सब तो होना ही चाहिए , लेकिन हमे यह भी ध्यान देना चाहिए की आदिवासियों में भी कई ग्रेड, कई स्तर के लोग होते है, कुछ आदिवासी काफी निचले स्तर पर ज़िन्दगी बसर कर रहे है, लेकिन हम उनके विकास के लिए कुछ नही कर रहे, हर आदिवासी को एक ही स्तर में देखते हैं । सरकार को इस पर सोचने की जरुरत है’।

गंगा भाई का कहना है हमारे यहाँ 5 अलग अलग प्रीमिटिव ट्राइब्स है जिसके लिए विकास प्राधिकरण भी बने हुए है। लेकिन अभी भी इन लोगों की ज़िन्दगी में ज्यादा सुधार देखने को नहीं मिलता। अगर आप आश्रम शालाओं का बजट और आश्रम शालाओं का स्तर देखें तो उसमे जमीन आसमान का फर्क है ।

 

आदिवासियों के कल्चर हैरिटेज को बढ़ावा देने प्लेटफोर्म जरुरी : मंजीत कौर

मंजीत कौर बल

मंजीत कौर बल जो जीव जंतु संरक्षण के अलावा पिछड़ी जनजातियों, पर्यावरण संरक्षण कार्यों में काफी समय से सक्रिय हैं कहती हैं “आदिवासी इलाको के लिए सिर्फ ट्राइबल डेवलपमेंट डिपार्टमेंट अपना बजट रखता है, लेकिन वह बहुत सीमित क्षेत्रों पर ही ध्यान केंद्रित करता है, जंगलों के संरक्षण के लिए भी बजट में कुछ होना चाहिए , हम तो अपनी ABCD सिखा रहे है लेकिन आदिवासियों के पास का ज्ञान कहाँ है, उसे कौन देख रहा है, आदिवासियों के कितने सारी गीत है, उसकी भाषाएँ है , कितने सारे जंगलों की कहानियां है।

मंजीत कौर आगे कहती हैं आदिवासियों के कल्चर हेरिटेज को बढ़ावा देने के लिए प्लेटफार्म होना चाहिए। आदिवासियों के हेल्थ सिस्टम की बात करें तो उसके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली जड़ी बूटियों जो काफी प्रभावी होती है, उनके लिए भी कोई रिसर्च डिपार्टमेंट होना चाहिए।

मंजीत का कहना है “पानी की सुविधा ऐसे क्षेत्रों में सबसे कठिन है और हमारे पंचायत रूरल डेवलपमेंट डिपार्टमेंट या पानी के दूसरे डिपार्टमेंट वहां तक पहुच ही नहीं पाते। आदिवासी आज भी प्राकृतिक स्थलों पर पानी के लिए निर्भर है, जैसे की झरने, उन्हें बचाने के लिए भी कही कोई परियोजना नहीं है, सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।

मंजीत कहती हैं “आदिवासियों के लिए कोई स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम देखने को नही मिलता। मिलेट कोदो-कुटकी के लिए समर्थन मूल्य तो घोषित किया गया है, लेकिन उसकी प्रोसेसिंग यूनिट का क्या ? उसके लिए भी सरकार को कुछ करना चाहिए।

काम ऐसा हो जिससे आदिवासियों की आजीविका सुनिश्चित हो : बंदोपाध्याय

गौतम बंदोपाध्याय

नदियों और जनजातियों के मुद्दों पर लगातार काम करने वाले रायपुर के गौतम बंदोपाध्याय कहते है कि आदिवासी के लिए ऐसी योजनाओं पर काम होना चाहिए जिससे आदिवासियों कि आजीविका सुनिश्चित की जा सके और आजीविका संसाधनों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

बंदोपाध्याय सुझाव देते हैं कि आदिवासी इलाकों में छोटे छोटे उद्योग खोलने की जरुरत हैं । असल में आदिवासी क्षेत्र में बडी समस्या शिक्षा और स्वस्थ्य है और इसके लिए स्पेशल पैकेज की जरुरत है ।

एक ट्राइबल एक्शन प्लान बनाने की जरुरत है जो स्पेशल पैकेज के साथ होगा।

उन्होंने कहा की इसमें राज्य और केंद्र सरकार को मिलकर काम करने की जरुरत है क्योंकि यह सारी समस्याओं का हल सिर्फ राज्य बजट से नही निकलेगा ।

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